Updated On: 17 Oct, 2025

नाबालिग पत्नी से संबंध बनाना रेप नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पलटा 18 साल पुराना फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने 2005 के एक मामले में सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए आरोपी को राहत दी है।

यह फैसला जस्टिस अनिल कुमार की एकल पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जब विवाह मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध रूप से हुआ हो और पत्नी की उम्र 16 वर्ष से अधिक हो, तो ऐसे संबंध को बलात्कार नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि यह निर्णय उस समय के कानून और सामाजिक संदर्भों के आधार पर दिया गया है।

मामला 2005 का है, जिसमें एक व्यक्ति पर आरोप था कि उसने एक नाबालिग लड़की का अपहरण कर उससे जबरन संबंध बनाए। निचली अदालत ने 2007 में आरोपी को आईपीसी की धारा 363 (अपहरण), 366 (अभिसरण के लिए प्रलोभन) और 376 (बलात्कार) के तहत दोषी ठहराकर सात साल की सजा सुनाई थी।

लेकिन हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि लड़की ने खुद बयान दिया था कि वह आरोपी के साथ अपनी मर्जी से घर छोड़कर गई थी और दोनों ने शादी कर ली थी। उसने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने विवाह के बाद वैवाहिक संबंध बनाए थे। ऐसे में अदालत ने कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी ने लड़की को बहलाकर या जबरन अपने साथ ले गया था।

कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में विवाह की न्यूनतम आयु के लिए अलग प्रावधान हैं और यदि विवाह वैध है, तो पति-पत्नी के बीच संबंधों को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

इस फैसले के बाद एक बार फिर मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाम भारतीय दंड संहिता की बहस तेज हो गई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय एक पुरानी व्यवस्था पर आधारित है, और इसमें नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर नए कानूनों और बाल विवाह निषेध अधिनियम की प्रासंगिकता पर भी पुनर्विचार की जरूरत है।