अवैध रेत परिवहन का किसने दिया जिम्मा? फर्जी बिलों पर भुगतान कर जनपद बुढ़ार के जिम्मेदारों ने की कितनी बड़ी हेराफेरी — बड़ा खुलासा
पत्रकार देवकांत मिश्रा ✍️ ✍️
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*अवैध रेत परिवहन का किसने दिया जिम्मा? फर्जी बिलों पर भुगतान कर जनपद बुढ़ार के जिम्मेदारों ने की कितनी बड़ी हेराफेरी — बड़ा खुलासा*
जनपद पंचायत बुढ़ार क्षेत्र के खम्हरिया ग्राम पंचायत में अवैध रेत परिवहन और फर्जी बिलिंग का एक बड़ा मामला सामने आया है। पंचायत लेखा-जोखा में जारी कुलदीप लाइट फिटिंग और लवकुश सेंटरिंग ब्रदर्स के नाम पर बने कई बिलों ने एक बार फिर पंचायतों में व्याप्त व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह कि यह बिल न तो किसी अधिकृत रेत व्यवसायी के हैं और न ही इनमें जीएसटी अथवा वैध पंजीयन की अनिवार्य जानकारी मौजूद है।
इसके बावजूद जिम्मेदारों ने हजारों-लाखों रुपये का भुगतान कैसे और किस आधार पर कर दिया—यह सबसे बड़ा सवाल है।
*रेत परिवहन के नाम पर हजारों का खेल*
प्राप्त बिलों में “रेत लोहमल पर्यवेक्षण/परिवहन” जैसे संदिग्ध शीर्षक का उपयोग किया गया है, जबकि पंचायत कार्यों में रेत सप्लाई के लिए मानक बिल, परिवहन पर्ची, रॉयल्टी चालान और जीएसटी नंबर अनिवार्य होता है।
बिलों में दिखाया गया है—
11 ट्रिप रेत परिवहन – ₹21,120
12 ट्रिप रेत परिवहन – ₹23,040
18 ट्रिप सेंटरिंग सामग्री – ₹14,400
अन्य मदों में जोड़कर कुल भुगतान – ₹37,440 से ₹80,150 तक
सबसे बड़ा सवाल यह है कि रेत परिवहन का कॉन्ट्रैक्ट एक ‘लाइट फिटिंग’ और ‘सेंटरिंग’ संचालक को कैसे दे दिया गया? क्या पंचायत के जिम्मेदारों को यह नहीं दिखा कि बिल जारी करने वाला न तो रेत व्यवसायी है और न ही उसके पास कोई वैध लाइसेंस?
*जीएसटी नंबर गायब — भुगतान फिर भी पूरा*
इन बिलों पर जीएसटी नंबर, रेत की रॉयल्टी, ट्रैक्टर/डम्पर नंबर, चालान, और रसीदें—कुछ भी नहीं है।
कानून के अनुसार बिना जीएसटी नंबर और बिना रॉयल्टी दस्तावेज़ के रेत-संबंधी किसी भी सेवा का भुगतान नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद पंचायत सचिव और जनपद के जिम्मेदारों ने—
*1. फर्जी बिल स्वीकार किए*
*2. ऑनलाइन भुगतान की प्रक्रिया पूरी की*
*3. पेमेन्ट को वर्क ऑर्डर दिखाकर मंजूरी दी*
इससे साफ है कि पूरा मामला एक संगठित मिलीभगत का संकेत देता है।
*लोकल बिल से लाखों की निकासी — कितने प्रतिशत का खेल?*
पंचायतों में लंबे समय से यह आरोप लगते आए हैं कि लोकल बिल के नाम पर सप्लायरों को फर्जी भुगतान कराया जाता है और इसका एक निश्चित प्रतिशत जिम्मेदारों तक पहुंचता है।
*इस मामले में भी—*
बिल में वस्तु की कीमत वास्तविक बाजार दर से कई गुना अधिक दर्ज
ट्रिप की संख्या बढ़ाकर दर्शाई गई
बिना जीएसटी और बिना स्टॉक एंट्री के भुगतान कराया गया
सप्लायर के हस्ताक्षर के अलावा कोई प्रमाण नहीं
यह इस बात का संकेत है कि पंचायत में रेत सप्लाई न होकर केवल कागजों पर बिल चढ़ाए गए।
*जनपद बुढ़ार की भूमिका पर बड़ा सवाल*
एक पंचायत स्तर का बिल जनपद से होकर ही पास होता है।
यानि—
*जनपद सीईओ, सब इंजीनियर, अकाउंटेंट और तकनीकी दल की स्वीकृति के बिना भुगतान संभव नहीं*
ऐसे में इन अधिकारियों ने फर्जी बिलों को देखकर भी आपत्ति क्यों नहीं उठाई?
जब बिल में रेत परिवहन दिखाया गया है, तो सर्वे/मापन रिपोर्ट कहां है?
पंचायत दर्पण में अपलोड की गई प्रविष्टियां किस आधार पर अनुमोदित हुईं?
यह मामला केवल पंचायत स्तर का नहीं बल्कि जनपद कार्यालय तक पहुंची बड़ी लापरवाही और संभवतः मिलीभगत को उजागर करता है।
रेत की जगह सेंटरिंग—क्या वाकई काम हुआ या सिर्फ कागज चला?
दूसरे बिलों में रॉड, सेंटरिंग प्लेट, चप्पा, शटरिंग आदि की सामग्री दर्शाई गई है।
लेकिन—
न तो साइट निरीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध
📷 न फोटो एविडेंस
न कहीं यह उल्लेख कि ये सामग्री किस काम में उपयोग की गई
यानी सामग्री की सप्लाई सिर्फ कागजों पर दिखाई गई और भुगतान असली काम की जगह फर्जी बिलों पर कर दिया गया।
👉क्या ग्राम पंचायत खम्हरिया में बड़े स्तर का घोटाला?
इन सभी बिलों की जांच करने पर कई अनियमितताएँ सामने आती हैं—
✔ *सप्लायर का कोई जीएसटी नंबर नहीं*
✔ *एक ही व्यक्ति के दो–दो व्यवसाय नाम—कभी लाइट फिटिंग, कभी सेंटरिंग*
✔ *रेत का परिवहन ऐसे व्यक्ति को दिया गया जिसका रेत से कोई संबंध नहीं*
✔ *रॉयल्टी, चालान, ट्रैक्टर नंबर, परिवहन रसीद कुछ भी नहीं*
✔ *भुगतान फर्जी बिलों के आधार पर स्वीकृत*
✔ *पंचायत दर्पण में गलत प्रविष्टियों का आरोप*
✔ *अजनपद के जिम्मेदारों द्वारा पूरी प्रक्रिया को अनदेखा किया गया*
यह सीधे-सीधे एक बड़े घोटाले की ओर इशारा करता है।
*जवाबदेही तय होनी चाहिए—जांच की मांग*
*स्थानीय ग्रामीणों की मांग है कि*—
1. पूरे भुगतान की तकनीकी एवं वित्तीय जांच हो
2. बिल जारी करने वाले, सचिव, इंजीनियर और जनपद अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए
3. पंचायत दर्पण में अपलोड किए गए दस्तावेज़ों की ऑडिट कराई जाए
4. रेत परिवहन के वास्तविक रिकॉर्ड को सार्वजनिक किया जाए
5. दोषियों के खिलाफ FIR दर्ज की जाए
👉 *जनता का सवाल बिल्कुल सीधा है*—
जब रेत आई ही नहीं, तो भुगतान किसके कहने पर और किसके खाते में गया?
और अगर रेत आई, तो उसका रिकॉर्ड कहाँ है?
यह पूरा प्रकरण पंचायतों में व्याप्त भ्रष्ट सिस्टम, फर्जी बिलिंग और प्रतिशतबाजी के गहरे खेल का खुलासा करता है। जनपद बुढ़ार के जिम्मेदारों को जवाब देना ही होगा कि आखिर फर्जी बिलों को वैध मानकर लाखों का भुगतान क्यों किया गया?

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