लापरवाही की हद: सिस्टम खरीदने की स्वीकारोक्ति के बाद भी कार्रवाई नहीं
जैतपुर/जैतपुर क्षेत्र में धान खरीदी का सीजन शुरू होते ही जिस पारदर्शिता और निष्पक्षता की उम्मीद किसानों को होती है, उसकी धज्जियाँ इस बार भी उड़ती दिख रही हैं। धान खरीदी केंद्रों में घटतौली, मनमानी, अवैध वसूली और फर्जी समिति संचालन का खेल फिर से तेज हो गया है। किसानों की मेहनत की कमाई पर खुलेआम डाका डाला जा रहा है, और प्रशासन आँख मूंदे बैठा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जैतपुर के धान खरीदी केंद्र में एक प्रभारी ने अपने रसूख का बेजा इस्तेमाल करते हुए खुले मंच पर यह बयान दिया कि “मैं भोपाल तक एसडीएम लेवल के अधिकारी को पैसे खिलाता हूँ, तभी एक सीजन में 50 लाख रुपए निकाल लेता हूँ।” यह बयान न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि धान खरीदी प्रणाली की सड़ चुकी व्यवस्था का जीवंत प्रमाण भी है।
🌾 किसानों की बदहाली, प्रभारियों की मौज— यह कैसा सिस्टम?
धान बेचने सुबह-सुबह लाइन में लगने वाले किसान घंटों कड़कड़ाती ठंड में इंतजार करते हैं। मशीनें खराब, तौल अधूरी, पोर्टल बंद, रजिस्ट्रेशन लटका हुआ— हर समस्या किसान को ही भुगतनी पड़ती है।
वहीं दूसरी तरफ केंद्र प्रभारी और समिति सदस्य AC कमरों में बैठकर फोन पर सौदे तय करते हैं। कई किसानों का आरोप है कि:
केंद्र प्रभारी के खास लोगों का धान तुरंत खरीद लिया जाता है
बाहरी व्यापारियों से मिलीभगत कर फर्जी किसानों के नाम पर धान खपाया जा रहा है।
हर बोरी पर कमीशन की खुली वसूली
पुराने मामलों में रिकवरी झेल रहे प्रभारियों के रिश्तेदारों को समिति में शामिल कर रखा गया इसका मतलब साफ है— धान खरीदी केंद्रों को निजी कमाई का अड्डा बना दिया गया है।
💰 “एक सीजन में 50 लाख निकाल लेता हूँ”— यह बेशर्मी नहीं तो और क्या?
स्थानीय किसानों का कहना है कि उस प्रभारी का असली असर इतना ज्यादा है कि कोई कर्मचारी विरोध करने की हिम्मत नहीं रखता। कई बार शिकायतें गईं, लेकिन हर बार फाइलें वापस वहीं जाकर बंद हो गईं जहाँ से निकली थीं।
उस प्रभारी द्वारा दिया गया कथित बयान क्षेत्र में आग की तरह फैल चुका है—
“एसडीएम भोपाल तक सेटिंग है। पैसे खिलाता हूँ तभी काम चलता है। मैं एक सीजन में 50 लाख कमा लेता हूँ। सरकार क्या कर लेगी?”
यह बयान न केवल भ्रष्टाचार को स्वीकार करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस हद तक यह नेटवर्क ऊपर तक फैला हुआ है।
🚨 प्रशासन मौन, किसान परेशान— आखिर कितने और सबूत चाहिए?
धान खरीदी केंद्र में रोजाना किसानों की भीड़ लगी रहती है। कई किसानों का यह भी कहना है कि जब वे धांधली का विरोध करते हैं, तो: उन्हें घंटों लाइन में खड़ा कर दिया जाता है। स्लिप रोक दी जाती है। धान की नमी का बहाना बनाकर वापस भेज दिया जाता है और कई बार धमकी भी मिली है कि “बहुत आवाज उठाओगे तो तुम्हारा कार्ड ब्लॉक करा देंगे” ऐसे में गरीब और मध्यमवर्गीय किसानों के पास चुपचाप सहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
🕵️♂ जांच की मांग— किसानों का सवाल: क्या सरकार कुछ करेगी?
स्थानीय सामाजिक संगठनों, किसानों और राजनीतिक प्रतिनिधियों ने इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि:
धान खरीदी केंद्रों का ऑडिट हो
प्रभारियों की संपत्ति जांची जाए
जिन पर रिकवरी चल रही है, उनके परिजनों को समिति से हटाया जाए
इस बयान की जांच कर प्रभारी को तुरंत निलंबित किया जाए
पोर्टल, तौल मशीन और खरीद प्रक्रिया को लाइव मॉनिटरिंग में लाया जाए किसानों का कहना है कि यदि धान खरीदी जैसे संवेदनशील विषय पर ऐसे भ्रष्ट लोग तैनात रहेंगे, तो सरकार की “किसान हितैषी” नीतियाँ जमीन पर कभी लागू नहीं हो पाएंगी।
📌 निष्कर्ष: जैतपुर का धान खरीदी केंद्र नहीं, पूरा सिस्टम बीमार है
जैतपुर में सामने आया यह प्रकरण कोई एक दिन की कहानी नहीं है— यह कई सालों से चल रही धांधली की परतों को खोलता है। जब एक प्रभारी खुलेआम कहता है कि “ऊपर तक सेटिंग है,” तो यह संकेत देता है कि भ्रष्टाचार कितनी गहरी जड़ें जमा चुका है।
किसान आज भी उसी धान के भरोसे घर चलाते हैं, बच्चों की फीस भरते हैं, बीज-खाद लाते हैं और साल भर की उम्मीदें पाले रखते हैं। ऐसे में यदि धान खरीदी केंद्र ही भ्रष्टाचार का गढ़ बन जाए, तो किसानों का भविष्य किस दिशा में जाएगा?
सरकार को चाहिए कि तुरंत इस मामले में कठोर कार्रवाई करे और किसानों को भरोसा दिलाए कि उनके पसीने की कमाई पर कोई भ्रष्ट माफिया हाथ नहीं डाल पाएगा।

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