वन विभाग का असली चेहरा: जैतपुर में पत्रकारिता पर हमला, IFS अधिकारी कटघरे में
जैतपुर/रसमोहनी।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ—पत्रकारिता—जब सत्ता और प्रशासन की जवाबदेही तय करता है, तब अक्सर कुछ अफसरों को यह आईना चुभने लगता है। कुछ ऐसा ही गंभीर और चिंताजनक मामला दक्षिण वन मंडल शहडोल के जैतपुर वन परिक्षेत्र अंतर्गत रसमोहनी क्षेत्र से सामने आया है, जहाँ IFS अधिकारी जसवंत मीणा पर पत्रकार के साथ बदसलूकी और कवरेज के दौरान मोबाइल छीनने का प्रयास करने जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। यह घटना न केवल प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि यह वन विभाग में व्याप्त ‘वर्दी के अहंकार’ और तानाशाही रवैये को भी उजागर करती है।
सूत्रों के अनुसार, क्षेत्र में वन विभाग की गतिविधियों—कटाई, परिवहन, या अन्य प्रशासनिक कार्रवाइयों—की जानकारी जुटाने और जनहित से जुड़े तथ्यों को सामने लाने के लिए एक पत्रकार मौके पर मौजूद था। पत्रकार अपना कर्तव्य निभा रहा था, कैमरा और मोबाइल से दृश्य रिकॉर्ड कर रहा था। इसी दौरान IFS अधिकारी जसवंत मीणा का व्यवहार अचानक आक्रामक हो गया। आरोप है कि उन्होंने पत्रकार से अभद्र भाषा में बात की, सवाल पूछने पर भड़क उठे और कवरेज रोकने के लिए मोबाइल छीनने का प्रयास किया। यह कृत्य सीधे-सीधे कानून, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना है।
प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला
भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। पत्रकारों को जनहित में सूचना एकत्र करने और प्रसारित करने का अधिकार है। लेकिन जब एक वरिष्ठ अधिकारी वर्दी और पद के दंभ में इस अधिकार को कुचलने की कोशिश करता है, तो यह केवल एक व्यक्ति का व्यवहार नहीं रह जाता—यह पूरे तंत्र की मानसिकता पर सवाल खड़े करता है। क्या वन विभाग अब जनता और मीडिया के प्रति जवाबदेह नहीं रहा? क्या सवाल पूछना अपराध बन गया है?
वन विभाग पर उठते गंभीर सवाल
यह पहली बार नहीं है जब दक्षिण वन मंडल शहडोल या जैतपुर परिक्षेत्र को लेकर सवाल उठे हों। अवैध कटाई, लकड़ी परिवहन, नियमों की अनदेखी और जमीनी सच्चाइयों से आंख मूंदने के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे में जब कोई पत्रकार इन मुद्दों की पड़ताल करता है, तो उसे डराने-धमकाने का प्रयास क्यों? क्या विभाग के भीतर कुछ ऐसा है जिसे छिपाया जा रहा है? क्या पारदर्शिता से डर इतना है कि सवाल पूछने वाले का मोबाइल तक छीना जाए?
‘वर्दी’ का अहंकार बनाम कानून
वर्दी कानून का प्रतीक है, अहंकार का नहीं। IFS जैसे प्रतिष्ठित पद पर बैठे अधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वे संयम, शालीनता और संवैधानिक मूल्यों का पालन करेंगे। लेकिन यदि आरोप सही हैं, तो यह आचरण सेवा नियमों और आचार संहिता का खुला उल्लंघन है। पत्रकार का मोबाइल छीनने का प्रयास न केवल गैरकानूनी है, बल्कि यह साक्ष्य से छेड़छाड़ और डराने की श्रेणी में आता है।
स्थानीय पत्रकारों में रोष
घटना के बाद स्थानीय पत्रकारों और मीडिया संगठनों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि आज एक पत्रकार के साथ ऐसा हुआ, तो कल किसी और के साथ भी हो सकता है। प्रेस पर दबाव बनाकर सच्चाई दबाने की यह प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है। पत्रकारों ने मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, संबंधित अधिकारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
प्रशासन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में
अब तक इस पूरे मामले पर वन विभाग या जिला प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट और ठोस बयान सामने नहीं आया है। यह चुप्पी भी संदेह को गहरा करती है। क्या प्रशासन अपने अधिकारी को बचाने में लगा है? या फिर जांच के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी है?
यह मामला केवल एक पत्रकार और एक अधिकारी के बीच का विवाद नहीं है; यह लोकतंत्र, प्रेस की स्वतंत्रता और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा है। यदि वर्दीधारी अधिकारी सवालों से बचने के लिए बदसलूकी और जबरदस्ती का सहारा लेंगे, तो यह व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं। जरूरत है कि शासन-प्रशासन इस घटना को गंभीरता से ले, दोषियों पर कार्रवाई करे और यह स्पष्ट संदेश दे कि लोकतंत्र में न तो वर्दी कानून से ऊपर है और न ही अहंकार सच से।

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