Updated On: 02 Apr, 2026

विकास के नाम पर खेल: चेतन कुशवाहा पर सरकारी धन के दुरुपयोग के गंभीर आरोप”

जैतपुर/शहडोल।

क्षेत्र में विकास कार्यों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों और सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ठेकेदार चेतन कुशवाहा पर सरकारी योजनाओं में भारी अनियमितता और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं। आरोप है कि अपनी कमाई बढ़ाने के लिए वह कहीं भी और किसी भी तरह से विकास कार्य करवा देते हैं, जिससे सरकारी धन का खुला दुरुपयोग हो रहा है।

बताया जा रहा है कि कई मामलों में बिना उचित प्रक्रिया और वास्तविक कार्य के ही बिल पास करा लिए जाते हैं। सूत्रों के मुताबिक पूर्व में एक ऐसा मामला सामने आया था, जिसमें बिना दुकान के ही फॉर्म के आधार पर रिकवरी की गई और संबंधित कार्य का भुगतान भी हो गया। यह घटना प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

वहीं, हाल ही में एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें एक स्टॉप डेम का बांध तालब से लगभग 200 मीटर पहले ही कर दिया गया। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इस निर्माण का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि जिस स्थान पर डेम बनाया गया है, वहां उसकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी। इससे न तो जल संरक्षण का उद्देश्य पूरा हो रहा है और न ही किसानों को कोई लाभ मिल रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि चेतन कुशवाहा द्वारा किए जा रहे कार्यों में गुणवत्ता का भी अभाव है। निर्माण कार्यों में घटिया सामग्री का उपयोग किया जा रहा है, जिससे कुछ ही समय में संरचनाएं जर्जर हो जाती हैं। ऐसे में सरकारी योजनाओं का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच पा रहा है।

स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि ठेकेदार और कुछ जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से यह पूरा खेल चल रहा है। बिना मौके का निरीक्षण किए ही फाइलों में कार्य पूर्ण दिखा दिया जाता है और भुगतान कर दिया जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सिस्टम में कहीं न कहीं बड़ी खामी है, जिसका फायदा उठाकर सरकारी पैसे का बंदरबांट किया जा रहा है।

ग्रामीणों में इस पूरे मामले को लेकर भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि अगर समय रहते इस पर कार्रवाई नहीं हुई, तो वे आंदोलन करने को मजबूर होंगे। लोगों की मांग है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में तकनीकी जांच और फील्ड वेरिफिकेशन बेहद जरूरी होता है। यदि कार्य स्थल का सही तरीके से निरीक्षण किया जाए, तो सच्चाई सामने आ सकती है। साथ ही, बिल पास करने की प्रक्रिया को भी पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में इस तरह की अनियमितताओं पर रोक लगाई जा सके।

इस पूरे मामले में संबंधित विभाग के अधिकारियों का पक्ष जानने की कोशिश की गई, लेकिन समाचार लिखे जाने तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर इस मुद्दे की चर्चा तेज हो गई है और जल्द ही जांच के आदेश दिए जाने की संभावना जताई जा रही है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कब तक विकास के नाम पर सरकारी खजाने को इस तरह नुकसान पहुंचाया जाता रहेगा। क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

(नोट: यह समाचार स्थानीय सूत्रों और ग्रामीणों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। प्रशासनिक जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।)